Saturday, 9 July 2016

परम ब्रह्म की व्याख्या - (Explaining Supreme intelligence through Non-intelligence) भर्तृहरि नीति शतकम - श्लोक ||१||

||भर्तृहरि नीति शतकम – मूर्ख पद्धति वर्णनम – श्लोक १||

संस्कृत श्लोक (original slok) -   दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानंतचिन्मात्रमूर्तये |
                                                 स्वनुभूत्येकमानायनम: शान्ताय तेजसे || १!!

भावार्थ - (approx. meaning) - मैं उस शांत तथा तेजस्वरुप ब्रह्म को नमस्कार करता हूँ, जो दिशा-काल आदि की सीमा से परे, अनंत, चैतन्य स्वरुप, केवल स्वानुभव के द्वारा ही बोधगम्य है.

व्याख्या - सामान्यतया हिन्दू-वैदिक संस्कृति में कोई भी सुभ कार्य करने के पहले ज्ञानी और तपस्वी ऋषि और बुद्धिजीवी श्रेष्ठ पुरुष ईश्वर के किसी न किशी स्वरुप को प्रणाम करते हैं, उसकी स्तुति करते हैं. जो भी उनके इष्टदेव होते हैं श्रेष्ठ पुरुष  उनके चरणों में प्रणाम करते हैं. यह भारतीय संस्कृति की सनातन और अमिट  परंपरा है. इसी तारतम्य में यहाँ पर राजऋषि एवं महान प्राचीन कवि भर्तृहरि जी अपना अति महत्वपूर्ण नीति-शतक काव्य ग्रन्थ प्रारंभ करने के पहले परम ब्रह्म परमेश्वर को प्रणाम कर रहे हैं उनकी स्तुति कर रहे हैं. वह ब्रह्म स्वरुप परमेश्वर के अन्य स्वरूपों भगवान विष्णु, भगवान शिव को अथवा जगदम्बा शक्ति की स्तुति कर सकते थे परन्तु यहाँ पर वह परम ब्रह्म परमेश्वर अर्थात एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति
(एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म) वाले स्वयम्भू स्वरुप की स्तुति करते हैं और अपना महान सौ श्लोकों का शतकग्रन्थ प्रारंभ करते हैं. 
           वेदों में गायत्री का एक अभिन्न स्थान है. गायत्री सभी मन्त्रों में श्रेष्ठ मन्त्र  माना जाता है. श्री राम शर्मा आचार्य जी ने गायत्री जी की उपासना एवं स्तुति में बहुत कुछ अनुभव किया और लिखा है और वह आज जग जाहिर है. गायत्री मन्त्र के अर्थ और भावार्थ ऋषि मुनियों ज्ञानियों द्वारा थोड़ा अलग-अलग व्याख्या किये गए हैं. गायत्री मन्त्र में उस परम ब्रह्म परमेश्वर के अद्वैत स्वरुप का वर्णन मिलता है. सभी उपाधियों से युक्त स्वयंभू वह परम ब्रह्म शांत और तेज स्वरुप है.  वह शांत है क्योंकि सारी रचनात्मकता शांति की स्थिति में आती है. कोई भी देव, मानव अशांति की स्थिति में रहकर लोकहित वाले रचनात्मक कार्य नहीं कर सकता है. और विद्या सम्बन्धी कार्य करने के लिए तो अत्यंत शांति की स्थिति चाहिए जहाँ व्यक्ति योगी स्वरुप होकर एकाग्र हो सके. यहाँ पर क्योंकि नीति सम्बन्धी बहुत महत्वपूर्ण ग्रन्थ पर कार्य होने वाला है इसलिए शांत बुद्धि का वातावरण चाहिए होगा. वह ब्रह्म शांत है जिस प्रकार ऋग्वेद में श्रृष्टि श्रृजन के पूर्व की स्थिति बताई गयी है. सब कुछ शांत था. नासदीय शूक्ति में यह बात आती है कोई हलचल नहीं थी ऐसी शांति का वातावरण. अतः वह ब्रह्म अद्वैत एवं शांत है विअसे ही जैसे माण्डुक्य उपनिषद् में उसे शिवम् शान्तं अद्वैतं बताया गया है. वह ब्रह्म तेज स्वरुप है. उसका तेज़ कोटि सूर्यों के तेज़ से भी बढ़कर है. उसके तेज़ के सामने कोटि सूर्य भी दीपक की तरह नज़र आते हैं ऐसा तेज़ है उस ब्रह्म का. वह ब्रह्म दिशा-काल आदि से भी परे है. परमेश्वर को दिशा और समय से नहीं बांधा जा सकता. वह कालातीत है. वह सभी दिशाओं में व्याप्त है, वह समय-काल से परे है. दिशाएं और काल उसकी मात्र कुछ विशेष गुणों (एट्रीब्यूट) में से हैं. ठीक वैसे ही जिस प्रकार एक मानव के कुछ विशेष  गुण होते हैं, पर मानव को गुण नहीं कहा जा सकता. जैसे मान के चलें की हमे कविता लिखना आता है या कि चित्र बनाना, तो कवित्त अथवा चित्रकार होना हमारे गुण हुए न की हम स्वयं. अतः इसी प्रकार वह ब्रह्म सर्वगुण संपन्न, काल-समय, दिशा से परे है. वह अनंत है, जिसका कोई अंत न हो. इस श्रृष्टि में जो भी जन्म लिया है उसका अंत है. जो दृश्य अथवा अदृश्य है उस सबका अंत है. मात्र ब्रह्म का अंत नहीं है. क्योकि वह श्रृष्टि के पहले भी था जब श्रृष्टि है तब भी है और जब यह दृश्य श्रृष्टि नहीं रहेगी तब भी रहेगा. उसके सभी गुणों की व्याख्याओं में से एक वह है जो ऋग्वेद की नासदीय सूक्ति में वर्णित है. जो भूत-वर्तमान-भविष्य के परे हो जिसका कोई अंत न हो वह अनंत है. जिसको समय-काल-दिशा में न बांधा जा सके वही अनंत है. जो हमारी मानवीय बुद्धि और सोच के भी परे हैं वह अनंत है.  उसके अनंत गुण विशेष के बाद वह सर्वथा चैतन्य भी है. अर्थात जो भूत-भविष्य-वर्तमान सभी अवस्थायों में कण-कण में व्याप्त हो, हर स्थान विशेष पर हर काल में विद्यमान रहे, सब कुछ देखने वाला हो,  हमारी नग्न आँखों से न दिखते हुए भी सभी काल, दिशा में व्याप्त हो. वह अनंत चैतन्य स्वरुप ब्रह्म कहलाता है.
       मानव और प्राणी की चैतन्यता मात्र निश्चित काल-समय और निश्चित  वस्तु विशेष के विषय में ही हो सकती है. सभी योनियों में मानव योनी को शास्त्रों में बौद्धिक क्षमता से युक्त कहा गया है. बांकी समस्त जीवों में मानव जैसी सभी इन्द्रियां (या सेंसेस) तो होती हैं पर तार्किक-इंटलीजेंस वाली सेंस नहीं होती, आज वर्तमान समय का भौतिक विज्ञान भी इस बात को मानता है. यह हमारे अन्दर जो बैद्धिक क्षमता है वही मानव को अन्य प्राणियों से अलग करती है और विशेष बनाती  है. हमारे धर्म और नीति शास्त्र भी कहते हैं कि आहार, निद्रा, भय, और मैथुन यह सभी प्राणियों में समान होता है. मात्र मानव की सोचने की तार्किक क्षमता और उसकी बुद्धि ही उसे सभी अन्य जीवों से अलग करती है.
               इस प्रकार वह ब्रह्म अनंत चैतन्य स्वरुप है. वह चैतन्यता सर्वव्यापी, सर्वकालाय है. इसीलिए हमारी सामान्य बोलचाल की भी भाषा में कहा जाता है कि ईश्वर सब कुछ देख रहा है उससे कुछ क्षिपा नहीं है. आखिर यदि ईश्वर मानव जैसे अथवा कोई भी अन्य जीव जैसे होता तो सब स्थानों पर सब कुछ सभी कालों में कैसे देख सकता था क्योंकि यह तो असंभव था? तो वह ब्रह्म क्या है? वह ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, अनंत और परम चैतन्य है. वह न दिखते हुए भी है, और न होते हुए भी है. यहाँ पर न होने का तात्पर्य मानवीय समझ का “न” होना अर्थात “शारीरिक अथवा भौतिक” रूप में “न” विद्यमान होना है.  
        अब उस अनंत, चैतन्य, शांत, तेज़ स्वरुप परम ब्रह्म की प्राप्ति कैसे होगी? क्योंकि मानवीय समझ में तो प्राप्त उसे किया जाता है जो दिखता हो और जो हमारी इन्द्रियों के अंतर्गत आता हो. अब ऐसे ब्रह्म जो कि न होते हुए भी है, न दिखते हुए भी सब देख रहा है, जिसके प्रकाश से सम्पूर्ण ब्रह्मांड प्रकाशित है, और जो अनंत, दिशा-काल से परे है, ऐसे ब्रह्म की प्राप्ति कैसे होगी? इस पर कहते हैं कि उस परम ब्रह्म को मात्र भाव (स्वानुभाव) से प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि तार्किक बुद्धि से तो वह परे है,  क्योंकि बुद्धि और तर्क साधन हैं साध्य नहीं. वह स्व-अनुभव से ही प्राप्त किया जा सकता है. मानव जीवन में ऐसे बहुत से अनुभव होते हैं जब इस सांसारिक शक्तियों से परे अन्य शक्तियों का भी बोध मानव को होता है. क्या आपके साथ ऐसा कभी हुआ है? निश्चित हुआ होगा. जब हम अत्यधिक कष्ट में रहे होंगे और कोई सुनने वाला न रहा होगा उस स्थिति में हमे अचानक कहीं किसी अन्य लोक से जैसे मदद आ गयी हो. हमारा कहीं जीवन संकट में रहा हो और वह ऐसे बच जाये जैसे कोई असम्भव शक्ति ने ऐसा कर दिया हो. और तो और सबसे बड़ी बात यही है की जब हम इस क्षणभंगुर जीवन के विषय में गंभीर होकर सोचें और विचार करें कि कैसे इस अनंत समय की धारा में हम एक अनंत रेखा में स्थित एक बिंदु से भी अल्प हैं तब हमे आभास होगा की इस श्रृष्टि का निर्माणकर्ता और इसे बनाने/चलाने  वाला कौन है? कोई ऐसा है जो सब कुछ बहुत अच्छी तरह से जानता है कि उसने क्या बनाया है और क्यों बनाया है. इतना अच्छा सामंजस्य ग्रहों में, ऊसकी ऋतुओं में, उसके चाँद उसके तारों में, सभी जीवों में और यहाँ तक निर्जीवों में भी, यह सब कैसे हो सकता है? इस प्रकार की सोच और बुद्धि, योग, अनुभव से ही उस सत, अनंत चैतन्य, परम आनंद स्वरुप ब्रह्म को समझा और प्राप्त किया जा सकता है. हिन्दू-वैदिक संस्कृति में उसे प्राप्त करने के विभिन्न मार्ग भी बताये गएँ हैं, षड्दर्शन ग्रंथों में भी इन्ही मार्गों का अलग-अलग ढंग से वर्णन व्यक्ति की जिज्ञासा, रूचि और प्रकृति के आधार पर बताया गया है. भारतीय संस्कृति के ग्रंथों में छहों दर्शन शास्त्रों का एक विशेस स्थान है. (बोलो सद्गुरु परम ब्रह्म परमेश्वर की जय...शिवानन्द द्विवेदी ....क्रमशः...)




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